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अँखियाँ हरि-दरसन की भूखी। कैसे रहैं, रूपरसराची ये बतियाँ सुनि रूखी॥ अवधि गनत इकटक मन जोवत तब एती नहिं झूखी। अब इन जोग-सँदेसन ऊधो अति अकुलानी दूखी॥ बारक वह मुख फेरि दिखाओ दुहि पय पिवत पतूखी। सूर सिकत हटि नाव चलायो ये सरिता हैं सूखी॥ गोपियाँ कहती हैं कि हे उद्धव, हमारी आँखें तो मात्र श्रीकृष्ण के दर्शन की भूख से पीड़ित हैं। वे आपकी योग शास्त्र-विषयक इन नीरस बातों को सुनकर कैसे जीवित रह सकती हैं? जब ये आँखें अपलक श्रीकृष्ण के आगमन की अवधि की गणना करती हुई उनका मार्ग देख रही थीं तब इतनी दु:खी नहीं थीं लेकिन अब तो इन योग के संदेशों को सुनकर बहुत व्याकुल और दु:खी हो गई हैं। उद्धव, तुम हमें कृष्ण की वह छवि पुनः दिखला दो जब वे वन में पत्तों के पात्र में गायों का दूध दुह कर पीते थे। हे उद्धव, तुम हठ करके बालू में नाव मत चलाओ क्योंकि ये नदियाँ सूखी हैं। अभिप्राय यह है कि जैसे बालू में नाव नहीं चलाई जा सकती, उसी प्रकार योगियों के लिए उपयुक्त यह योग-साधना गोपियों को नहीं बताई जा सकती। #radhekrishna #vrindavan #bankebihari #krishna #igreach #viral #like #spiritualindia #radheradhe

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