हमारे माता पिता बनने के बाद समय की गति को नापना हमारे लिए असंभव हो गया है। समय के पंख लग गए है और हम उसकी पीठ पर सवार जीवन को व्यतीत कर रहे है। आने वाले हर एक बदलाव को समझ रहे है, सीख रहें है, जान रहे हैं, अपना रहे हैं और जी रहे है।
कहते कहते कल हमारी बेटी का चूड़ाकरण संस्कार संपन्न हुआ। परिवार के महत्त्वपूर्ण सदस्य, बड़ों का आशीर्वाद और ब्रह्मांड के सभी देवी देवताओं की कृपा से हमारे द्वारा एक के बाद एक सनातनी संस्कार होते जा रहे है।
इस संस्कार को मुंडन भी कहते हैं। "अले, बेबी टकलू हो गई!" यह बात हमने पिछले ४० घंटों में इतने अलग अलग स्वर परिवर्तन में सुनी की शास्त्रीय संगीत के रागों की स्थिति बातों में दिखने लगी थी। मन में असीम शांति है।
वेदों में इस संस्कार का उल्लेख हैं, और इसे करने के कई कारण भी बताए गए हैं। आपने भी अपनी दादी, नानी से सुने ही होंगे।
मेरे अंदर की मां पढ़ाकू है। हमेशा ही सब की सुनकर खुदका का पढ़ना है, समझना है और अपने भावार्थ को धारणा में ढाल कर जीने का प्रयास रहता है। सब कुछ पढ़के मुझे यहीं समझ आया कि ,"अपने बच्ची के मस्तिष्क का सार्थक सदुपयोग ही चूड़ाकरण का वा...
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