उम्मीद पर दुनिया क़ायम है…
तारों से टिमटिमाती आँखों में वो मुसाफ़िर,
इस दुनिया की होड़ से परेशान,
सिर्फ़ उन उम्मीदों के भरोसे अपने उस चाहत,
या उन सपनों के सागर से भरी हुई अँखियाँ में,
अपनी मंज़िल तय करती है वो मुसाफ़िर,
निराशा तो होती रहती है,
मगर पीछे नहीं हटने की ताक़त से आगे बढ़ती है,
वो मुसाफ़िर।
वो लक्ष्य ही अब सब कुछ है,
उसके बिना अब यह जीवन अधूरा है,
बिना उसके साथ के,
कुछ भी नहीं है वो मुसाफ़िर,
सागर की गहरायी,
बर्फ़ीली पर्वत के चट्टान से भी ऊपर,
उसकी उम्मीद पे टिकी रहना चाहती है,
वो मुसाफ़िर।
अपने दिल में इस दुनिया को बदलने की ख़्वाब संजोती है वो मुसाफ़िर,
अब चाहे आये तूफ़ान या लहरें,
लड़ के विजयी प्राप्त करने की ख़्वाब देखती है वो मुसाफ़िर,
हिम्मत और आशा तो उस सूरज की किरण की है,
मगर गिर के उठने की प्रार्थना करती है,
वो मुसाफ़िर।
- Diksha
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