कल फिर वही दिन होगा, वहीं पुरानी जिंदगी होगी, कुछ बदल कर देखना हैं तो नई जगह पे चलें जाना, जिंदगी बुरी नहीं हैं समझ में आयेगा। हम घेरे हुए हैं, वही पुरानी बातों में, ख़ुद के बनाये उसूलों के साथ आई कठिनाइयों में। कई लोग तो अटके हैं उन्हीं पुरानी ज़िद पर…
तुम अगर अब तक नहीं जान पायें हो ज़िन्दगी का सच, तो थोड़ा खुलकर बताए?
बता तो देंगे लेकिन आपके मन में उतनी भी जगह हैं की कुछ बदलाव कर सको?
फिर भी बताती हूँ… ज़िन्दगी तुम्हें नहीं तुमने ख़ुद जिंदगी को बाँध रखा हैं । बाँध रक्खा हैं अपने बनावटी समाज के उसूलों की वजह से, बाँध रखा हैं अहंकार की वजह से, बाँधा हैं ज़िम्मेदारियाँ उठाने के बाद एक दिन मिलने वाली तारीफ़ की वजह से और किसी किसी ने बाँधा हैं अपने ही बनाये ज़िद्दी दायरों से।
ख़ुद की इमेज बचाने के चक्कर में ना जाने कितने बर्बाद हुए, कितने अकेले हो गए, बात समझ में आई, आँख खुली लेकिन वो ज़िन्दगी का आखरी दिन था।
- पूजा ढेरिंगे
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