जीवन चक्र – एक कविता
झूले में मुस्काता शिशु, आँखों में नई चमक,
दुनिया से अनजान है वो, हर धड़कन एक चहक।
नन्हे हाथ, नर्म सी साँसें,
सपनों की कोमल सी बाँहें।
बचपन आया दौड़ता, किलकारियाँ ले आया,
हर गली, हर पेड़-पौधा, जैसे दोस्त बन आया।
खेल में सजे जहाँ,
हर बात में छुपा आसमां।
किशोर मन फिर आग बना, कुछ पाने की चाह जली,
प्रेम में डूबे पल हुए, जीवन की पहली हलचल चली।
गलतियाँ, अनुभव बने,
दिल के पन्नों पर रंग बने।
जवानी आई जिम्मेदारी की चादर ओढ़कर,
सपनों का घर बसाया, थकते नहीं हैं भोर तक।
संघर्षों में बीतें साल,
पर आँखों में अब भी कमाल।
बुढ़ापा आया धीरे-धीरे, चाँदी से बालों के संग,
कहानी हर झुर्री कहे, जीवन के संगीत के रंग।
धीमी चाल, शांत स्वभाव,
पर अनुभव में गहरा प्रभाव।
फिर एक दिन सब थमता है, सांसों का संगीत रुकता,
पर यहीं से कुछ फिर शुरू हो, जीवन चक्र फिर से चलता।
एक गया, एक आया यहाँ,
ये चक्र चलता है सदा जहाँ।
शिशु से वृद्ध, एक सफर,
हर पड़ाव में छुपा असर।
जीवन का ये सुंदर घेरा,
जैसे समय का अनमोल सवेरा।
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