पाक जज्बात...
धून बेईंतीहाँ मोहब्बत की,
मैने खद से बनायी है...
लफ्जों का साज चढा ऊसपर,
जबसे तू जिंदगी में आयी है...
खिल ऊठी जिंदगी फिरसे,
फिरसे सब रंगीन हूआ...
छूआ तूने जबसे जहन को मेरे,
मै थोडा और हँसीन ह्आ...
तू कौन मै कौन,
यें मै नहीं सोचता बिलकूल भी...
एक पल के लिए भी तूझे भूला न सकूँ,
जाऊँ अगर मै खूद को भूल भी...
तू याद रखा कर मूझे हर पल,
ये मै बिलकूल नहीं कहता...
मूझे पता है मेरा दिल अब तेरे,
सिनेके घरौंदे में है रहता...
ईश्क ईश्क होता है,
ईसमे कोई कायदे नहीं होते...
ईस पाक जज्बात को,
सही गलत के मायने नहीं होते...
अगर कूछ गलत लगे जज्बातमें तो
वो ईश्क-ए-जज्बात नही...
जरासी भी खूदगर्जी हो मनमें,
तो वो जज्बात भी पाक नही...
वो जज्बात भी पाक नहीं...
© निशब्द | Nishabd
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