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सादगी... तूम अलग हो दूनिया से, आँखें मगर तूम्हारी बहुत बोलती हैं... लब खामोश रहते हैं तेरे, पर निगाहें दिल के राज़ खोलती हैं... न माथे पर कोई गुरूर है तेरे, न बातों में कोई बनावट है... जितनी सरल तेरी बातें है, उससे कहीं गहरी तूम्हारी आहट है... न ज़ेवरों की चमक चाहिए तूझे न श्रृंगार का कोई अभिमान है... तेरी सादगी ही ऐसा गहना है, जिस पर ये दिल बेइंतिहा कुर्बान है... मुस्कुरा दे तू सादगी से अगर, तो जैसे मौसम मुस्कुरा जाता है... तू बालों को यूँ ही सँवारती है, तो चाँद भी नूर भूल जाता है... न कोई बनावट, न कोई दिखावा,। तेरी सादगी में ही छुपा है मेरा प्यार... तू जितनी सहज, उतनी ही गहरी, जैसे खामोश दरिया में उतरता जाए कोई बार-बार... तेरे चेहरे की वो मासूमियत, हर बेचैनी को सुकून बना देती है... तू कूछ कहती नहीं, फिर भी तेरी आँखें, तूम्हारी हर अनकहीं बात सुना देती हैं... सादगी भी सादगी भरी है तूम्हारी, जो हर दिखावे से परे लगती है... तू जितना खुद को रखती है साधा , मेरी नजरों को ज्यादा सूंदर दिखती है... तेरी आवाज़ मिठी नहीं मधूर है, सुनकर जिसे रूह मे सुकून उतरता है... तूम्हारी खामोशी ऐसा गी...
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