सपनो भरी सूबह...
फासलों में ईन सांसों को,
चैन कहां आता है ?
डाली से टूटी कली का जैसे,
रंग उतर जाता है...
तू है हर आरजू मेरी,
तुझसे ही जज्बातों का आशियाँ...
तू नहीं तो करती है बातें,
मूझसे मेरी खामोशियाँ...
आ मेरी इन खामोशियों को,
तू अपनी जूबां दे दे...
हूं लिपटा अंधेरे से,
सपनों भरी एक सुबह दे दे...
सपनों भरी एक सुबह दे दे...
© निशब्द | Nishabd
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